घर बैठे बैठे पढ़िए एक और कविता हमारे साथ

तू रूठा हुआ लगता है
तेरा रूत जाना भी जायज लगता है
गलती जो करते हम तो माफ़ी मांग लेते
पर हमारे गुनाहो पर तेरा सजा देना भी मुनासिब लगता है

जब  तकलीफ हमे होती है
तो इन बारिश की बूंदों में रोया तू भी लगता है
खेर छोड़ सारे शिकवे-गिले
कर तू वही जो तुझे सही लगता है

लेखिका-
मोक्षदा मोना शर्मा
शिवपुरी

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